लंदन से चार्टर्ड अकाउंटेंसी, चॉल का बचपन; चाचा के बिजनेस को संभाला और HDFC को भारत का सबसे बड़ा हाउसिंग फाइनेंस बनाया

मुंबई की एक साधारण चॉल में जन्मे दीपक पारेख ने लंदन में पढ़ाई की, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग में करियर बनाया, लेकिन चाचा हसमुखभाई पारेख के आग्रह पर 50% कम सैलरी पर HDFC जॉइन किया। उन्होंने कंपनी को सिर्फ हाउसिंग फाइनेंस नहीं, बल्कि एक पूरे फाइनेंशियल ग्रुप में तब्दील कर दिया, जहां आज करोड़ों भारतीयों का घर का सपना पूरा होता है।

लंदन से पढ़ाई, इंडिया में नौकरी; रिटायरमेंट के बाद शुरू किया बिजनेस और खड़ी कर दी HDFC! चॉल में बीता था बचपन

दीपक पारेख का जन्म 18 अक्टूबर 1944 को मुंबई में हुआ था। परिवार गुजराती जैन समुदाय से था और शुरुआती जीवन मुंबई की एक चॉल में बीता, जहां सादगी और मेहनत की सीख मिली। स्कूलिंग सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, फोर्ट से पूरी की और उसके बाद सिडेनहम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स से बी.कॉम की डिग्री हासिल की।

1965 में वे इंग्लैंड पहुंचे और इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स इन इंग्लैंड एंड वेल्स (ICAEW) से चार्टर्ड अकाउंटेंट क्वालीफाई किया। लंदन में उन्होंने Whinney, Smith and Whinney (जो बाद में Ernst & Young बना) में आर्टिकल्स पूरे किए। यह अनुभव उन्हें इंटरनेशनल फाइनेंस और अकाउंटिंग की गहरी समझ दे गया।

लंदन से वापसी के बाद उन्होंने Precision Fastners, ANZ Grindlays और Chase Manhattan Bank में काम किया। Chase Manhattan में वे अच्छी पोजिशन और दोगुनी सैलरी पर थे, लेकिन परिवार और देश के प्रति जिम्मेदारी ने उन्हें एक बड़ा फैसला लेने पर मजबूर किया।

उनके चाचा हसमुखभाई टी. पारेख (H.T. Parekh), जो ICICI के चेयरमैन रह चुके थे, ने 1977 में रिटायरमेंट के बाद HDFC (Housing Development Finance Corporation) की स्थापना की। उस समय भारत में हाउसिंग फाइनेंस का कोई बड़ा प्राइवेट संस्थान नहीं था। आम भारतीय को घर खरीदने के लिए लोन मिलना मुश्किल था। H.T. Parekh ने इस कमी को दूर करने के लिए HDFC शुरू किया, शुरुआती कैपिटल महज 10 करोड़ रुपये के साथ।

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1978 में, 33-34 साल की उम्र में दीपक पारेख ने चाचा के आग्रह पर HDFC जॉइन किया। सैलरी आधी कर ली, लेकिन विजन बड़ा था। वे डिप्टी जनरल मैनेजर के तौर पर शामिल हुए। शुरुआत में कंपनी छोटी थी, लेकिन दीपक पारेख ने इसे सिस्टेमेटिक तरीके से बढ़ाया। उन्होंने ट्रांसपेरेंसी, कस्टमर-सेंट्रिक अप्रोच और मजबूत गवर्नेंस पर फोकस किया।

1983 में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बने, फिर मैनेजिंग डायरेक्टर और 1993 में चेयरमैन। उनके लीडरशिप में HDFC भारत की सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी बन गई। कंपनी ने मिलियंस ऑफ मिडिल क्लास फैमिलीज को अफोर्डेबल होम लोन दिए। उन्होंने रिस्क मैनेजमेंट, टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन और एक्सपैंशन पर जोर दिया।

दीपक पारेख ने HDFC को सिर्फ हाउसिंग फाइनेंस तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने ग्रुप की संरचना बनाई:

1994 में HDFC Bank की शुरुआत (Aditya Puri के साथ), जो आज भारत का सबसे बड़ा प्राइवेट सेक्टर बैंक है।

HDFC Life Insurance, HDFC ERGO General Insurance, HDFC Mutual Fund, HDFC Credila (एजुकेशन लोन), और अन्य सब्सिडियरीज।

इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग के लिए IDFC में भी नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन रहे।

उनकी मेहनत से HDFC ग्रुप का असेट बेस बिलियंस में पहुंचा। 2022-23 में HDFC Ltd और HDFC Bank का मर्जर हुआ, जिससे दुनिया के सबसे वैल्यूएबल लेंडर्स में से एक बना। मर्जर के समय HDFC ग्रुप का मार्केट कैपिटलाइजेशन लाखों करोड़ रुपये था।

दीपक पारेख ने कभी ज्यादा शेयरहोल्डिंग नहीं रखी (करीब 0.04%), लेकिन ट्रस्ट और इंटेग्रिटी से कंपनी को मजबूत बनाया। उन्होंने Padma Bhushan (2006) समेत कई अवॉर्ड्स जीते।

उनका पूरा करियर दिखाता है कि सादगी से शुरूआत, इंटरनेशनल एक्सपोजर और देश के लिए कमिटमेंट से कितना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। चॉल से लंदन और फिर HDFC की कमान संभालकर उन्होंने साबित किया कि सपने बड़े हों तो रास्ते खुद बन जाते हैं।

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